भारत जैसे देश में महिला सम्मान व सशक्तिकरण राह पड़ी वह कुतिया है, जिसे जब मन आया लात मारा, और आगे बढ़े!
एक दिन चिल्लायेगें फिर फायदा उठाएँगे....
मौसम दर मौसम
साल दर साल
उठता रहा है
नारी मुक्ति का प्रसंग
रैलियों में, धरनों पर
बैठकों में, मंचों पर
अखबारों में, टी.वी पर
होती रही हैं बहसें
महिला दिवस के
आसपास उग आते हैं
सड़कों पर
महिला हकों के
सैकड़ों झंडाबरदार
हर तरफ मचता है
नारी मुक्ति का शोर
धूप चश्मे, रंगीन छतरी में
उतरती हैं सड़कों पर
संभ्रांत-प्रगतिशील औरतें
लगाती हैं नारे
करती हैं प्रदर्शन
अपनी ताकत का
स्त्री हकों की खातिर
न्यूज चैनलों पर
उठाती हैं आवाज
नारीवादी सपनों में
भरी जाती हैं उड़ान
नारी मुक्ति की आड़ में
चलाते हैं सब दुकानें
वातानुकूलित कमरों में
होतीं हैं नारी मुक्ति पर
ढ़ेरों बैठकें, परिचर्चाएं
न्यूज चैनल लगाते हैं
ऐसी खबरों का तड़का
हंगामा खड़ा करना
शगल है मीडिया का
लड़कियों की मंडी
मसाज पार्लर का धंधा
अश्लीलता और नग्नता
भाता है चैनलवालों को
खबरों से गायब होती हैं
स्त्रियों की परेशान जिंदगी
घुटन, संत्रास, निराशाएं
उनके दुख और आंसू
सड़क से संसद तक
खायी जाती हैं कसमें
लिए जाते हैं संकल्प
मिलेगा पूरा हक
पर मिलता है
केवल तिरस्कार
बारम्बार
आज भी यहां
मारी जाती हैं
कोख में कन्याएं
थमती नहीं है
दहेज हत्याएं
दौड़ायी जाती हैं
नंगी कर औरतें
होता है चीरहरण
यहां द्रौपदी का
देती रही है आयशा
परीक्षाएं
नहीं मिला हैं
आजतक स्त्री को
अपनी शर्तों पर
जीने का अधिकार
किंतु, परंतु में
सिमट रह जाती हैं
सारी बहसें
बदलती नहीं हाशिए की
महिलाओं की सूरतें
सदियां गुजरी
नही बदली स्थिति
बदली नहीं मानसिकताएं
चलती रही हैं बहसें
और यूँही
चलती रहेंगी बहसें
बार-बार, हर बार
क्यूँ???