Sunday, 8 March 2015

अनकहे शब्द

बहुत अच्छा लगता था
तुम्हारा साथ
ढेरों बातें करना चाहता था
तुम से हर बार

जाने क्यों
मिलने पर भी
सब अनकहा रह जाता था

कितने मीठे थे वो शब्द
जो कहे नहीं गये
शायद
कहने से
मिठास जाती रहती

हमारे बीच
अनकहे को
यूँ ही रहने देना
कितना कर्णप्रिय था

चुप रह कर
हम
एक दूसरे से
बहुत बोलते

न रह सका
एक शब्द भी
प्रेम का बिना सुने

आज सारे
शब्द गूँज
रहे हैं
कानो मे

एक कूक की तरह

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